मजदूर की कथा

मजदूर की कथा
हे मजदूर!
तुम शेषनाग का रूप हो
उठा रखा है तुमने धरती का बोझ
अलसुबह
तुम्हारे हाथों का संगीत बजता है
सायरन की आवाज के साथ
जुत जाता है वह
दुनिया के तमाम
खुरदरेपन को करने समतल
वह निरंतर भाग रहा है
श्रम की धरती पर अनथक
हे मजदूर
श्रम कर्म पथ की कसौटी
पर मजबूती से खड़े
तुम लौह पुरुष हो
हे मजदूर!
तुम नहीं मजबूर
तुम जीवन के हो कारीगर
तुम विशाल कठोर हृदय के तपस्वी
पुरूषार्थ जीवन के आधार हो
हे मजदूर
तुम केवल श्रमिक नहीं
कठिन परिश्रम करने वाले
इस जगत के सबसे विश्वसनीय शूरवीर हो
कर्मपथ पर चलने वाले कर्मवीर हो
हे मजदूर
तुम्हारी श्रम की महिमा है अपरम्पार
समर्थवान संवेदना से भरे
एक सच्चा मनुष्य हो
निर्माण और जीवन के बीच एक पुल हो तुम
दुनिया को जानने और समझने की कुंजी। भी हो
हे मजदूर
तुम सबके बीच
सबकी पहचान हो
तुम राहों की धूल के बीच
फूल हो जीवन का
हे मजदूर!
तुम्हारी खून पसीने से चमकती दमकती खेत खलिहान
सजते संवरते बाग बगियान।
ऊंचे अट्टालिका तुम्हारी पहचान। हैं
हे मजदूर!
प्रतिबद्धता और संबद्धता की मिसाल हो
सच!
वर्षा झंझा धूप के बीच उम्मीद हो तुम
हे मजदूर!
सुख से बहुत दूर
अपने दुख सृजन और मेहनत की गान हो तुम
अंधेरे में रोशनी हो तुम
तुम जीवन की आग हो
पानी हो
सांस हो
किसी भी समाज की पहचान हो
सिपाली गुप्ता
पश्चिम बंगाल



