शीर्षक – समय , रिश्ते और नज़रिया

शीर्षक – समय , रिश्ते और नज़रिया
इंसान जिंदगी भर रिश्तों की भीड़
में फंसा रहता है,
ये जिंदगी खुद को परिस्थिति
के अनुसार बदलना पड़ता है।
बस दौड़ता रहता है,
भागता रहता है।
मां बाप हमारे चेहरे
की थकान को पढ़ लेते है।
जब जिंदगी का अंतिम पड़ाव
आता है तो सुकून तलाशता है।
लेकिन सुकून उसे वहीं जिसने
अपनी मां बाप की इज्जत खो दी,
वो दुनिया में कहीं भी इज्जत पा ही
नहीं सकता।
माता पिता बूढ़े नहीं होते,
वह बस चुप हो जाते है।
क्योंकि उन्हें पता है,
बच्चे अब बड़े हो गए है।
लेकिन दिल बड़े नहीं हुए।
माता पिता को बाद में बात करता है,
ये कहनेवाले पछताते है।
क्योंकि जब बाद में बचता ही नहीं तो
यादें रह जाती है।
कुछ रिश्ते अपने होते हुए भी
अपने नहीं होते,
रिश्ते तिनका तिनका लम्हा लम्हा
हालात से गुजरते है।
उगता है सूरज जब नीले गगन में
वो नज़रिया ही है,
सपने साकार करने के लिए
दिन रात कम पड़ जाते है।
राजलक्ष्मी अग्रवाल, गुवाहाटी।




