स्वरचित कविता – विषय – “अरावली पर्वत श्रृंखला की चीख

स्वरचित कविता – विषय – “अरावली पर्वत श्रृंखला की चीख”
मैं पत्थरों की नहीं
पुरानी सदियों की स्मृति हूँ.
मैं रेत, जंगलों और नदियों की मौन प्रहरी हूँ.
मैं रोकती हूँ, थार -मरुस्थल की ठंडी हवाओं को.
मैं संजोती हूँ, जैव विविधता और पशु -पक्षीयों के आशियानों को..
फिर क्यों मेरी छाती पर मशीनों के नाख़ून गड़े जा रहे है?.
क्यों जैव विविधता, और संकटग्रस्त जीवों के सपनों को कुचलकर लाभ के नक्शे बनाये जा रहे है.??
मैं तो शहरों को आंधी -तूफानों से बचा रही हूँ..
फिर क्यों शहर के लोग मुझे भुलाये जा रहे है?.
मेरी चीख क्यों धुएँ में घुलती जा रही है..?
और मैं क्यों कागजों की फाइलों में दम तोड़ती जा रही हूँ.??
सुप्रीम कोर्ट की कैसी यह गजब की परिभाषा??
जैव विविधता को खत्म करने का क्यों यह अजब का तमाशा?
आओ हम सब मिलकर सरकार एवं सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ कुछ मुहीम चलाएं…
प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण हेतु एक साथ मिलकर कदम बढ़ाये…
आओ मिलकर हम सोशल मीडिया,, समाचार पत्रों जैसे जनसंचार के माध्यमों से अरावली के चीख को रोकने का बीड़ा उठाये….
नाम – ललिता डोभाल ‘प्रज्ञा ‘
पता – बड़कोट, उत्तरकाशी (उत्तराखंड )




