साहित्य रचना

ईमान बिक रहे

ईमान बिक रहे

आज के ज़माने में सबसे सस्ताईमान है

जरा जरा सी चीज़ों से बिक रहा ईमान है

इतना लोभ बढ़ गया है आज के इंसानों में

बुद्धि, विवेक, धैर्य, ईमान कहीं खो गया है लोगों में

ईमान बिक रहा है सस्ते सस्ते-चीज़ों से

और लोग खुश हैं कि मेरा मैदान जीत लिया

अभी तो सस्ते में ही ईमान बिक रहे

आज प्रश्न पत्र आउट करते ईमान पहले बिके

गरीबों का लूट रहे डॉक्टर का ईमान बिके

स्वार्थ की हस्ती बढ़ रही लोगों के ईमान बिक रहे

राजनीति की गलियों में ईमान बिक रहे

जो पहरेदार थे अब चोर दिख रहे

प्रत्येक मानव में सिर्फ ढांचा रह गया

अंदर से ईमान- बिक गए

बेइमानों के हाथों सब चीज़ बिक रहे

और लेने वाले वही मनुष्य हैं जिनका ईमान बिक चुके

नीलम प्रभा सिन्हा

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