दुनिया

शीर्षक – मैं घर वहीं हूं कुछ बदला बदला सा है

 

शीर्षक – मैं घर वहीं हूं कुछ बदला बदला सा है 

 

मैं घर वहीं हूं, कुछ बदला बदला सा है,

पहले घर छोटा था,

दिल बड़ा था।

प्यार, स्नेह और एकता की

 भावना मजबूत होती थी।

 

घर पर खुशियों की बहार थी।

हर किसी के चेहरे पर मुस्कान थी 

 

समय बदला घर बड़ा हुआ,

परिवार के साथ की कमी हुई।

 

मां भजन गाती,लोरी सुनाती 

मां की रोटी का स्वाद ,

प्रेम अनोखा होता है।

अब नया अनुभव, नई सोच, नया जीवन है,

वह दरवाजे वहीं दीवारें है।

पर अब कुछ बातें पहली जैसी 

नहीं है।

 

बड़ा परिवार था,

सब का साथ थे।

 

दादा- दादी की कहानियां 

सुनते थे। 

मां बाप के साथ खुशियों का

समय बिताते थे।

 

भाई बहन के साथ खेलते थे ,

 

अब परिवार बिखर गया।

हर कोई अपने रास्ते पर है।

 

मैं घर वहीं हूं, कुछ बदला बदला सा है।

 

पहले के दिन जब जीवन 

सरल था,

 

वह घर जो खुशियों से भरा था।

प्यार, स्नेह का दुलारा था।

जहां बचपन बीता, यादें ताजा 

जहां पिता की डांट, भाई बहन का प्यार,

 

जहां जीवन का सहारा 

देता है संस्कार।

 

जमाना है बदल रहा।

अब रिश्तेदारों की पहचान फेसबुक पे।

 

राजलक्ष्मी अग्रवाल, गुवाहाटी।

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