राज्य

पूस की ठिठुरन

 

” पूस की ठिठुरन “

 

भारत वर्ष ऋतुओं का देश,

कण- कण का यहाँ मोल ।

कभी सर्दी, कभी गर्मी,

कभी बरसात के मीठे बोल ।

 

पूस की ये ठिठुरन अदभुत,

सर्दी संग मीठे का स्वाद ।

कहीं धुंध तो कहीं कोहरा,

आग की गर्मी से हो रहे आबाद ।

 

दिन छोटे और रात बड़ी,

सूरज बिना बनें न बात ।

गुड़, तिल, मूंगफली का सेवन,

रजाई में चले यादों की बारात ।

 

गर्म कपड़ों की बढ़ती मांग,

दान- धर्म का चलता दौर ।

हम भी थोड़ा हाथ बढ़ाएँ,

मन का मिट जाए चोर ।

 

गेंहूँ, मटर, सरसों की फसल,

चहूँ और फैली हरियाली ।

आलू, शक्करकंद की मांग,

कर देती ठिठुरन की बहाली ।

 

गाजर के हलवे की मीठास,

खजूर, बादाम, अखरोट के तेवर ।

अदरक, इलायची, सौंप की चाय,

देते असीम खुशी जैसे जेवर ।

 

परिवर्तन- प्रकृति का नियम,

हम भी समय की करें कद्र ।

परोपकार कुदरत का सार,

हम भी बनें सर्वत्र भद्र ।

 

जीव-जन्तुओं का रखें ख्याल,

हम सब सृष्टि के अंश ।

ठिठुरन कहे मत सिकुड़ो,

बनों न किसी के लिए दंश ।

 

हम सभी बरतें सावधानी,

ट्रेफिक नियमों का पालन करें ।

बुजुर्गों का ध्यान रखकर,

प्रभु चरणों में ध्यान धरें ।

चन्द्रवती दीक्षित

करनाल हरियाणा

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