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कागज़ों में सख्ती, ज़मीन पर रेत माफिया की बादशाहत: कटनी में कलेक्टर के निर्देश बनाम ढीमरखेड़ा–उमरियापान की भयावह हकीकत, नाबालिगों से श्रम, रात में खुलेआम अवैध परिवहन और शासन को लाखों का चूना

“कागज़ों में सख्ती, ज़मीन पर रेत माफिया की बादशाहत: कटनी में कलेक्टर के निर्देश बनाम ढीमरखेड़ा–उमरियापान की भयावह हकीकत, नाबालिगों से श्रम, रात में खुलेआम अवैध परिवहन और शासन को लाखों का चूना”

 -जिले में अवैध उत्खनन, परिवहन एवं भंडारण पर सख्त नियंत्रण के लिए कलेक्टर श्री आशीष तिवारी द्वारा राजस्व, पुलिस, खनिज एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को संयुक्त कार्रवाई के स्पष्ट निर्देश दिए जा रहे हैं। बैठकों में सख्ती के संदेश और नियम-कानून का हवाला दिया जा रहा है, लेकिन जमीनी सच्चाई इससे बिल्कुल उलट तस्वीर पेश कर रही है। ढीमरखेड़ा तहसील के उमरियापान क्षेत्र में हालात ऐसे हैं मानो कानून का कोई अस्तित्व ही न हो।

 

प्रत्यक्षदर्शियों और स्थानीय सूत्रों के अनुसार, दिन के उजाले में अवैध रेत घाटों पर महिलाओं और नाबालिग बच्चों से रेत निकलवाई जा रही है। यह न केवल बाल श्रम निषेध एवं विनियमन अधिनियम 1986 (संशोधित 2016) का खुला उल्लंघन है, बल्कि मानवाधिकारों पर भी सीधा प्रहार है। शाम ढलते ही तस्वीर और भयावह हो जाती है—रात के अंधेरे में प्रशासन की नाक के नीचे से ट्रैक्टर ट्रालियों द्वारा पूरी रात अवैध रेत का परिवहन होता है।

 

चौंकाने वाली बात यह है कि कोई रेत ठेकेदार नहीं है जो रॉयल्टी काट सके जिन नदी घाटों से रेत निकाली जा रही है, वे कई स्थानों पर स्वीकृत खनन क्षेत्र ही नहीं हैं। इसके बावजूद खुलेआम उत्खनन जारी है, जिससे नदियों की धाराएं बदल रही हैं, पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंच रहा है और पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986, मध्यप्रदेश खनिज नियम, तथा एनजीटी के दिशा-निर्देशों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। इस अवैध कारोबार से शासन को लाखों रुपये के राजस्व का नुकसान हो रहा है।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि कार्रवाई केवल दिखावटी है। सड़क पर कभी-कभार कोई वाहन दिख गया तो उस पर औपचारिक कार्रवाई हो जाती है, लेकिन असली खेल खदानों और अवैध घाटों पर चल रहा है, जहां खनिज, राजस्व और पुलिस विभाग का अमला शायद ही कभी पहुंचता है। यदि वास्तव में निष्पक्ष छापेमारी की जाए, तो अवैध रेत खनन के पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश हो सकता है।

 

पूरे क्षेत्र में रेत माफियाओं का आतंक व्याप्त है। ग्रामीण बोलने से डरते हैं, क्योंकि विरोध करने वालों को धमकाने की घटनाएं सामने आती रही हैं। सवाल यह है कि जब कलेक्टर स्तर से निर्देश स्पष्ट हैं, तो फिर ढीमरखेड़ा–उमरियापान में कानून क्यों बेबस नजर आ रहा है? क्या यह प्रशासनिक लापरवाही है या फिर मिलीभगत का खेल?

 

अब आवश्यकता है कि कागजी निर्देशों से आगे बढ़कर स्थल निरीक्षण, रात्रिकालीन छापे, अवैध घाटों को तत्काल सील करने, दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई और बाल श्रम में लिप्त लोगों पर सख्त कानूनी कदम उठाए जाएं। तभी प्रशासन की सख्ती पर जनता का भरोसा कायम रह सकेगा, अन्यथा यह सवाल यूं ही गूंजता रहेगा—कानून किसके लिए और माफिया किसके भरोसे?

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