साहित्य रचना

प्रभु से विनय

प्रभु से विनय

 

 हे परमपिता परमेश्वर प्रभु से विनय है दोनों कर जोड़। 

 बस धीरज का छोर न छूटे, जीतूं मैं जीवन की दौड़ । 

जीवन संघर्ष के बीच मन धीरज धरे, आए कितने ही मोड़। 

आशा और हौसला देना प्रभु ,अधबीच में देना न छोड़। 

प्रियपति वियोग का दुख दिया प्रभु तुमने ,साथ दिया अमूल्य जीवन का निचोड़ । 

मैंने,अतीत भूत -वर्तमान -भविष्य की चिंता दी है छोड़ । 

प्रभु भजन- कीर्तन- ध्यान -लीला गुणगान से ,मन को दिया जोड़ । 

मन में कोई इच्छा शेष नहीं है, मिला परम संतोष ,नहीं करनी अब कोई होड़। 

मानवीय गुणों से दिल भरा रहे ,हे प्रभु कृष्ण रणछोड़ । 

बस मन का धीरज छोर न छूटे ,पकड़े रहना जीवन की डोर ,हे रणछोड़ । 

अब दुख -बधाएं कभी न देना ,जो जीवन को दे तोड़ मरोड़। 

जब मन का धीरज छूटे ,प्रभु तुम्हें पुकारूँ, मदद को आना ताबड़तोड़। 

तुम ही हो सबल सहारा प्रभु ,मुझसे मुंह न लेना मोड़ ।

रचयिता 

डॉक्टर शशिकला अवस्थी इंदौर मध्य प्रदेश

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