साहित्य रचना

नहीं हो सकते है कभी भी तुम अकेले ।

नहीं हो सकते है कभी भी तुम अकेले ।

बस अपने शौख को जिंदा रखना होगा।।

 

चेहरे से उदासी हटाना होगा और अकेले पन का भी एहसास भुलाना होगा।

हर शख्स के अंदर कोई ना कोई हुनर होता है।

बस उस हुनर को जिंदा रख सामने लाना होगा।

 

तमाम उम्र बीता दिया बस इसी सोच में की लोग क्या कहेंगे?

लोगो ने क्या किया तेरे लिए सोच कर देखना होगा।

 

छोड़ लोगो की परवाह अब अपने बारे में सोचना शुरू कर।

अब अपने बारे में बस तू फिकर कर।

 

तुमने जो ये मानुष तन पाया है हर बार किसी को मिलता नहीं है।

इस बार जो मिला है तुमको अपनी इच्छा कोई अधूरी रखना नहीं है।

 

सभ्यता और संस्कार को ले कर साथ अपने कर्तव्य सारे पूरे कर लिये तुमने।

हर जिम्मेदारी अपनी बखूबी निभा लिया है तुमने।

 

अब तक जिया अपनों के लिए अब अपने लिए जीना है।

सबको याद रखना मगर खुद को भूल कर भी भूलना नहीं है।

बंदना मिश्रा 

देवरिया उत्तर प्रदेश 

गोरखपुर

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