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सुप्रीम कोर्ट ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी EWS श्रेणी के उम्मीदवार अथर्व चतुर्वेदी को अस्थायी रूप से MBBS में प्रवेश देने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 का उपयोग किया।

अथर्व ने NEET 2024 में 720 में से 530 अंक प्राप्त किए थे।

अंक अच्छे थे, लेकिन 2 जुलाई 2024 की मध्यप्रदेश सरकार की नीति के कारण उन्हें निजी मेडिकल कॉलेजों में EWS सीट नहीं मिल सकी।

राज्य की उस अधिसूचना में सरकारी कॉलेजों में EWS आरक्षण लागू था,

लेकिन निजी मेडिकल कॉलेजों में EWS कोटा लागू नहीं किया गया था।

मामला पहले हाई कोर्ट गया।

हाई कोर्ट ने अधिसूचना को बरकरार रखा, लेकिन सरकार को निर्देश दिया कि भविष्य में सीटें बढ़ाकर EWS आरक्षण लागू किया जाए।

इस बीच 2025–26 का सत्र सामने था।

नीतिगत देरी के कारण अथर्व का एक साल दांव पर लग सकता था।

यहीं पर सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप किया।

अनुच्छेद 142 का उपयोग करते हुए कोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक देरी या नीतिगत खामियों का नुकसान किसी मेधावी छात्र को नहीं उठाना चाहिए।

और उनके प्रवेश को सुरक्षित किया।

ध्यान देने वाली बात यह भी रही कि अथर्व ने स्वयं अपना पक्ष रखा,

और मुख्य न्यायाधीश ने उनके प्रयास की सराहना की।

यह मामला सिर्फ एक छात्र का नहीं है।

यह उस बड़े सवाल से जुड़ा है कि क्या नीतियों के निर्माण और क्रियान्वयन में स्पष्टता और समानता सुनिश्चित हो रही है?

EWS आरक्षण का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को अवसर देना है।

लेकिन अगर नीति अधूरी हो या लागू करने में देरी हो,

तो लाभ वास्तविक पात्र छात्रों तक नहीं पहुँच पाता।

राजनीति से परे,

यह चर्चा ज़रूरी है कि

क्या राज्य स्तर की नीतियाँ केंद्र के संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप हैं?

क्या निजी संस्थानों में आरक्षण का ढांचा स्पष्ट और पारदर्शी है?

और क्या प्रशासनिक देरी से छात्रों का भविष्य प्रभावित नहीं हो रहा?

यह मामला हमें याद दिलाता है कि

संविधान के प्रावधान सिर्फ किताबों में नहीं,

बल्कि ज़मीनी न्याय देने के लिए भी हैं।

नीति पर बहस हो सकती है।

विचार अलग हो सकते हैं।

लेकिन किसी छात्र का एक साल बर्बाद न हो,

यह सबकी साझा जिम्मेदारी होनी चाहिए।

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