साहित्य रचना

नवरात्रि और संस्कृति

 

अन्तर्राष्ट्रीय साहित्यिक मित्र मंडल, जबलपुर, मध्यप्रदेश। *काव्य गोष्ठी हेतु*

दिनांक: 26 मार्च 2026
विषय: नवरात्रि और संस्कृति

*नवरात्रि और संस्कृति का मूल*

नौ दिन दीपक जलते हैं, हर घर में उजियाला,
पूजा की तान, धरती पर संस्कृति का पसारा।

घरों में राग, ताल, भजन, मन में खुशियाली,
पाँव थिरकते घर मंदिर, जाता कलह से दूर मन।

गानों की धुन भी इन दिनों भजन‑सी लगें,
बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक, एक ही भक्ति में रमें।

छोटे बच्चे माता का रूप लिए घर‑घर जाते,
मीठी बातें, पकवान लड्डू, हर दिल में खुशी बसाते।

बुज़ुर्ग कहानियाँ सुनाएँ, भगवान, देवी की गाथा,
पुरखों की संस्कृति का असर नजर आता।

गरबा, नृत्य, भंगड़ा, हाथ में हाथ,
एक राष्ट्र, एक भावना, नवरात्रि का यही साथ।

और जब आख़िरी दिन आता, आरती बजती है धीरे‑धीरे,
तो लगता है जैसे संस्कृति खुद भी चलती है माँ की तरह।

नवरात्रि बस त्योहार नहीं, यह जीवन का संदेश है,
शक्ति, संस्कृति, समर्पण और एकता का गहरा वेश है।

डॉ. मोनिका रघुवंशी
कुटुंब क्रमांक 2439

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