साहित्य रचना

मानसिक जकड़बंदी

 

मानसिक जकड़बंदी

सदियों पुरानी बात हो या नए ज़माने के विचार,
हमारी सोच को भाए वही सही, बाकी सब बेकार।
वैज्ञानिकता सिद्ध करे किसी तथ्य का सार,
या हमें मानव बनाए हमारे सुंदर संस्कार।
पर जब हम मानसिक जकड़बंदी में बंध जाते हैं,
लाख बुराइयों के बाद भी उसे सही ठहराते हैं।

चाहकर भी सोच हमारी, औरों में नहीं ढूँढ़ती खूबी,
पर विलुप्त गलतियाँ भी खोज निकालती है बखूबी।
किसी असहाय को देखकर चुपचाप निकल जाते हैं,
पर अपनी बारी में उम्मीदों का दामन फैलाते हैं।
बढ़ना तो चाहते हैं, पर संकीर्ण सोच में जकड़कर,
विकास नहीं, औरों की गलतियाँ गिनते रहते चुन-चुनकर।

प्यार-दुलार दें, सम्मान करे हर कोई हमारा,
पर हम तो अच्छे हैं, चाहे करें किसी का अपमान या किनारा।
खुद गलती करके बहानों के सहारे चल देते हैं,
पर दूजा मर्यादा संग क्षमा माँगे, यही चाहते हैं।
समय के साथ सोच हमारी होती जा रही है छोटी,
जैसे पहले युगों में विचार बड़े थे, और ऊँची थी कद-काठी।

संतोषी डनसेना (रूही)
जशपुर छत्तीसगढ़

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