साहित्य रचना

हम जानकर भी अनजान बन जाते हैं

 

“हम जानकर भी अनजान बन जाते हैं”

हम जानकर भी अनजान बन जाते है।

हम जानते है…

(1)यह नश्वर जग/ संसार में सब मोह-माया है। 

मोक्ष प्राप्ति लक्ष्य है ।ध्यान, स्वप्राप्ति ही साधना है।

 फिर भी आत्मा को बेवजह भटकाते है।

 हम जानकर…

(2) उत्तम आचरण, विचार, व्यवहार

अच्छी सोच, चिंतन्- मनन ,

मानव को श्रेष्ठ बनाते हैं। 

यह जानकर भी हम व्यर्थ की बातें, चुगली, बुराई, 

दिनभर की व्यथा गाते हैं।

दूसरों की बुराई में हम भी बतियाते है ।  

कर्म के फल जानकर भी अनजान बन जाते हैं।

(3) जानते है -सब राजनीतिक पार्टियाँ 

विरोधाभास के ऊपरी दिखावे है।

 आवश्यकता पर कसौटी की , धरातल पर सब एक है।

फिर भी आम जनता के वाद-विवाद में स्वयं को 

पार्टियों में उलझ पाते पाते है। 

एजेंडा और व्यवहारिकता में हम ठगा जाते हैं।

(4) देश के युवा हमारा भविष्य है ; आधार है, धरोहर है हमारी ।

हमको अपने संस्कार- संस्कृति से 

आगे इनको बढ़ाना हैं।

अंधेरी राह के ये नन्हे मुसाफिर नशे,बेगारी,परेशानी में

जब अकेले, बेबस भटक जाते हैं।

कभी प्रेमसे हारे कभी अपनों से दुत्कारे हुए

 दिखाई दे जाएं ..तब हम अनजान बन जाते है

(5)हम जानते है- नारी देवी का रूप है।

युवा पीढ़ी के लिए जग‌द‌म्बा स्वरूप है।

 ऐसी देवी स्वरूपा जब मोबाइल चलाने 

या रिल बनाने में व्यस्त बच्चों से विरक्त होजाती है. 

संस्कारधारिणी, संस्कृति के बहाव को रोक, खुद में गुम होने लगी।

 देश की संताने, संस्कार विहीन हो रही ।

 द्रवित मन से खिन्न होकर भी अनजान बन जाते है।

(6) शिक्षा मानव को उत्कृष्ट, बनाती है।

संघर्षमय जीवन को स्वर्ण सा चमकाती है।

बेबस हम- मेकाले शिक्षा पद्धति ने 

जीविकोपार्जन मात्र बना दिया जीवन को।

अच्छी स्कूल, अच्छा कॉलेज,अच्छी आमदनी

बस इतनी जीवन की राह बची।

कार, घर, विवाह तक मानव की सीमा बनी।।

, सत्कर्म, धर्म, सेवाभाव में आयी कमी।

गुरु-सन्त देखकर भी अपना ध्यान हटाते हैं।

(7) हम जानते हैं- पिता देवता का रूप है।

 भैरु-शिव- ब्रह्मा स्वरूप है। ।

अपने आदर्शों को धर के ताक पर

 बच्चों में अभिमान, जगाते हैं। 

अपमान अपना तो मंजूर नहीं, 

औरों को सम्मान देने में झुंझलाते हैं।

 नैतिकता व सच्चाई की राह से हम अनजान है।

(8)अच्छा पर्यावरण है जीने के लिए जरूरी पर,

 जल, वायु ध्वनि प्रदूषण में है गुणोत्तर वृद्धि।।

 आदर्शवादी बाते करते सब बड़ी-बड़ी ,

 अपना व्यवहार स्वयं जब आंकते हैं ,

सबसे अधिक कमियाँ स्वयं में पाते हैं ।

हम जानते हुए भी अनजान बन जाते हैं।।

मौलिक व स्वरचित 

-पूजा शर्मा

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