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विषय कभी लगे  बरखा रानी तो कभी बरखा बैरन

 

दिनांक 12/07/2026

दिन_रविवार 

विषय कभी लगे 

बरखा रानी तो कभी बरखा बैरन

शीर्षक आषाढ़ का महीना 

 

बरखा रानी! हम तेरा इन्तजार करते, 

गर्मी सहते महीना बिता मगर तूं ना आए।

बरखा रानी गर्मी बेशुमार पड़ रही,

ए.सी. कूलर भी ठंडक ना पहुंचाए।

बैसाख जेठ सुखा बिता तभी समझ में आ गया, 

बैरन बरखा अभी नहीं आने वाली है,

रोज देखते राह तेरी तू झूम के कब आए।

पर क्या मजाल जो तू टस से मस हो जाए।

ऐसे में कोई कैसे भरोसा करले तेरा तू हितैषी है मेरा,

हवा चले तो लगे बरखा रानी प्यारी अब आए।

देखा तुम तो हवा संग उड़ती चली गई और 

हम राह देखते रहे ऐसे में तू बरखा बैरन सी लगती,

मुझे तेरी छिछोरी गर्मी अब नहीं सुहाए।

कभी लगे तूं बरखा रानी, कभी बरखा बैरन बनती, 

कभी रिमझिम जल बरसाती,

पेड़ पौधे हरे हो जाते चारों तरफ हरियाली छा जाए।

धानी चुनरिया जब ओढ़े लिया धराने अब तो,

मंद- मंद मुस्कुराती तब नाचे,

दादुर मोर पपिहा बोले कोयलिया शब्द सुनाए।

हर एक बीज गिरा जहां पर अंकुरित होता,

या पौधा उगाया सौलह श्रृंगार कर धरा खडी़ है

बरखा रानी जल बरसाएं।।

पुष्पा निर्मल 

    बेतिया बिहार ©®

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