साहित्य रचना

 

स्वरचित कविता – विषय -बेज़ुबान की आवाज…

हर गांव, हर शहर की गली के साये में,, मैं चुपचाप सिमट सा जाता है
ज़ब दुनिया सो जाती है,, तब मैं रो पाता हूँ…
कभी मैं सड़कों के कोने पर विवश सा पड़ा रहता हूँ…
हर गुजरते हुए इंसान को बस यूँ ही किसी आस के साथ ताकता रहता हूँ…

 

ना मेरा नाम है,, ना ही मेरी कोई पहचान
इस मानव बस्ती में, मैं क्यों इतना अनजान??
मत मारिये मुझे,, मैं कुछ कह नहीं पाता
मेरे आँसू तो देखिये,, मैं भी दर्द सह नहीं पाता l

 

तुम जो रोटी यूँ ही फेंक देते हो रास्तों पर
मैं उसे भी प्यार समझकर समेट लेता हूँ
कभी डंडो, पत्थरों से मारा जाता हूँ, तो कभी दुत्कारा जाता हूँ
फिर भी मैं हर इंसान को अपनेपन में पाता हूँ l

 

मत फेरा करिये यूँ नजरें मुझसे
मैं भी इस जग का हिस्सा हूँ
ख़ामोशी ही सही लेकिन दर्द का एक किस्सा हूँ,
मेरे आँखों में झाँकोगे, तो तुम खुद सा मुझे भी पाओगे
जो दर्द मुझे दे रहे है आज वही लौट के रोयेंगे l

 

भूख, प्यास से मैं भी बिलखता हूँ, पर आवाज नहीं निकाल पाता
मैं बेज़ुबान हूँ,, ना, इसीलिए दर्द भी नहीं बता पाता l

 

ललिता डोभाल ‘प्रज्ञा ‘बड़कोट उत्तरकाशी (उत्तराखंड )

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