साहित्य रचना

शीर्षक: जानकर भी अनजान बन जाते हैं

 

शीर्षक: जानकर भी अनजान बन जाते हैं

 

हम सब कुछ जानते हुए भी अनजान बन जाते हैं,

सच को परखने की क्षमता रखते हैं,

फिर भी अक्सर दूसरों की बातों को ही मान लेते हैं।

 

क्या हम खुद को नहीं जानते?

हमें क्या चाहिए, हमारी खुशी किसमें है—

यह सब कहीं भीतर छुपा होता है।

 

अंदर से हम खुद को पहचानते हैं,

मगर बाहर की दुनिया के सामने

अनजान बनकर जीते रहते हैं।

 

हमारे अंतर्मन में चल रहा द्वंद

हमें अपनी पहचान के लिए लड़ने को कहता है,

लेकिन बाहर की दुनिया

चुपचाप सहने का पाठ पढ़ाती है।

 

जहाँ हम खुद को नहीं,

बल्कि दूसरों की जिंदगी जीने लगते हैं,

अपनों की खुशी के लिए

अपनी ही खुशियों से दूर हो जाते हैं।

 

शायद जिंदगी की जंग लड़ते-लड़ते

हम थक गए हैं,

हमारे कदम रुक गए हैं,

और हमारी पहचान कहीं खो गई है।

 

रिश्तों की डोर संभालते-संभालते

हम खुद से ही दूर होते जा रहे हैं,

अंदर के अकेलेपन को जानते हुए भी

उससे अनजान बने रहते हैं।

 

हम भीतर से टूटे हुए होते हैं,

फिर भी आईने के सामने

मुस्कुराना नहीं भूलते।

 

क्या आपने कभी सोचा है—

क्या आप खुद को जानते हैं?

या सब कुछ जानते हुए भी

अपनों के सामने हारकर अनजान बन जाते हैं?

 

दुनिया की खुशियों के लिए

अपनी खुशियों से मुँह मोड़ लेते हैं,

त्याग और बलिदान की मूर्ति बनते-बनते

क्या हम पत्थर तो नहीं बन गए?

 

जिसका शरीर तो जीवित है,

पर आत्मा कहीं खो चुकी है,

जो खुद के लिए भी

संवेदनहीन हो गया है।

 

क्या आप खुद को जानते हैं,

या जानकर भी अनजान बनते जा रहे हैं?

 

स्वाधीनता के नाम पर

हम आज़ाद तो हैं,

लेकिन आज भी

अदृश्य जंजीरें हमें पीछे खींचती हैं।

 

हँसते हुए चेहरे के पीछे छुपा दर्द

दुनिया से अनजान रहता है,

और हम सब कुछ जानते हुए भी

अनजान बने रहते हैं।

 

यह सिर्फ एक वाक्य नहीं,

बल्कि हमारी सच्चाई है—

जो हमें आईना दिखाती है।

 

लेखिका: मनीषा कुमारी

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