छोटा यह जीवन रहा, रखो बड़ी तुम सोच।

छोटा यह जीवन रहा, रखो बड़ी तुम सोच।
हिय धर के निष्कामता, करो सनातन खोज।।
बड़े सत्कर्म से यह जन्म पाया है ये मानव का
सफर यह था बहुत लम्बा,कई जन्मो के पुण्यों का
देवता भी रहे तरसे, इसे सद ग्रंथों ने गाया
काम कुछ ऐसा कर जाये,हो व्यापक अंग सृष्टि का।
जन्म जन्मों से थे भटके, रहे इस देह की खातिर
हमारे कर्मो ने पायी कृपा ईश्वर की भी आखिर
निरापद ईश का आभार कुछ ऐसे रहे करते
जन्म मानव का दे करके, किया धन्य धान्य से पूरित।
सफल इस जन्म को ऐसे करे,हर शौक हो जिन्दा
मिले हक़ जीने का सबको,मनुज,पशु या हो परिंदा
सभी से खूबसूरत बनती है ये दुनिया रही सारी
भूल कर भी कभी ना हम करे किसी और की निंदा।
स्वयं जीये सभी को और जीने दे निरापद ही
जानते जीवन में आएंगे अगणित और आफत भी
बाँट कर दुःख दूसरे का रहे सुख देते हम उनको
चुनौती धर्म को देता रहा ये कर्म शाश्वत ही।
सिंचित हो धरा सारी हमारी प्यारी खुशियों से
करे महसूस ईश्वर को सुनो हम बंद अखियों से
करे आभार हम उन पांच तत्वों का अनवरत ही
मिला जिससे है ये तन है नमन पावन उन्हें मन से
करे हम धन्य यह जीवन,और परलोक भी अपना
सभी के स्वप्न हो पूरित फले सबकी ही कामना
रास्ता एक है निर्मेष रहे हम बन निमित्त सबके
सदा उपकार का हो भाव फलित सद्भावना होवे
निर्मेष




